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नाबालिग को जेल में नहीं रखा जा सकता है — सुप्रीम कोर्ट
February 14, 2020 • छोटा अखबार • देश - विदेश

नाबालिग को जेल में नहीं रखा जा सकता है — सुप्रीम कोर्ट

छोटा अखबार।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की खंडपीठ ने कहा है कि किसी नाबालिग को जेल में या पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता है। साथ ही न्यायालय ने साफ किया कि किशोर न्याय बोर्ड मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता है। देश में सभी किशोर न्याय बोर्ड को किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की अक्षरश: भावना का पालन करना ही चाहिए। बच्चों के संरक्षण के लिए बने कानून की उपेक्षा किसी के द्वारा नहीं की जा सकती। कम से कम पुलिस के द्वारा तो बिल्कुल भी नहीं।   


न्यायालय ने यह बात उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली में नागरिकता कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में  बच्चों को कथित रूप से पुलिस हिरासत में रखकर प्रताड़ित करने के मामले कही। 
समाचार सूत्रों के अनुसार न्यायालय ने उत्तर प्रदेश और दिल्ली के बाल अधिकार संरक्षण आयोग को आरोपों की जांच करने के निर्देश भी दिये है। जवाब पेश करने के लिये कोर्ट ने   तीन हफ़्तों का समय दिया है। 
कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 10 के तहत पुलिस द्वारा पकड़े गए बच्चे को विशेष किशोर पुलिस यूनिट या किसी नामित अधिकारी की निगरानी में रखने के लिये कहा है। धारा के प्रावधानों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कथित रूप से कानून के साथ छेड़छाड़ करने वाले किसी बच्चे को पुलिस हिरासत में या जेल में नहीं रखा जाएगा। एक बच्चे को जैसे ही जेजेबी के सामने पेश किया जाएगा, उसे जमानत देने का नियम है।


न्यायालय ने अपने 10 फरवरी के आदेश में कहा कि अगर जमानत नहीं दी जाती है, तो भी बच्चे को जेल या पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता और उसे निरीक्षण गृह या किसी सुरक्षित स्थान पर रखना होगा। सभी जेजेबी को कानून के प्रावधानों की भावना का अक्षरश: पालन करना चाहिए। हम यह स्पष्ट करते हैं कि जेजेबी मूकदर्शक बने रहने और मामला उनके पास आने पर ही आदेश पारित करने के लिए नहीं बनाए गए हैं।
पीठ ने ये भी कहा कि जेजेबी के संज्ञान में अगर किसी बच्चे को जेल या पुलिस हिरासत में बंद करने की बात आती है, तो वह उस पर कदम उठा सकता है। यह सुनिश्चित करना जेजेबी की जिम्मेदारी है कि बच्चे को तुरंत जमानत दी जाए या निरीक्षण गृह या सुरक्षित स्थान में भेजा जाए।
पीठ ने शीर्ष न्यायालय के कार्यालय को निर्देश दिया कि वह इस आदेश की एक प्रति सभी उच्च न्यायालयों के महापंजीयकों को भेजे, ताकि प्रत्येक उच्च न्यायालय में किशोर न्याय समितियों को आदेश मिल सके और वे यह सुनिश्चित करें कि आदेश को सख्ती से लागू करने के लिए इसकी एक प्रति प्रत्येक जेजेबी को भेजी जाए।