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अमित शाह की दलील का सच
January 23, 2020 • छोटा अखबार • देश - विदेश

अमित शाह की दलील का सच

छोटा अखबार।
नागरिकता संशोधन अधिनियम से देश भर में जनता के जहन में कई तरह के विचार बन और बिगड़ रहे है। वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह बार-बार इस अधिनियम के पक्ष में तर्क पेश कर रहे हैं।
18 जनवरी 2020 शनिवार को कर्नाटक के हुबली में एक रैली में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में बुद्ध के पुतले को तोप से गोले दाग़ कर फूँक दिया गया। उन्हें (हिंदू-सिख अल्पसंख्यक) वहां (अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान) चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं दिया, स्वास्थ्य की सुविधाएं नहीं दी गई, शिक्षा की व्यवस्था उनके लिए नहीं की। जो सारे शरणार्थी थे हिंदू, सिख, जैन बौद्ध ईसाई वो भारत के अंदर शरण लेने आए।
बात ये है कि देश के गृह मंत्री नागरिकता संशोधन अधिनियम के बारे में तर्क दे रहे थे कि कैसे अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले सिख, हिंदू शरणार्थी को उनके देश में सताया जा रहा है और उन्हें मौलिक अधिकार नहीं दिए जा रहे।ये नया कानून पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए गैर-मुस्लिम समुदाय को नागरिकता देने की बात करता है।अधिनियम के इस प्रावधान का ही लोग विरोध कर रहे हैं।

छोटा अखबार ने कोशिश की है कि वर्तमान समय में अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को चुनावी प्रक्रिया के क्या-क्या अधिकार दिए गए हैं।

आइये पढ़ते है एक रिर्पोट 
पहले हम बात करते है पाकिस्तान की। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 51 (2A) के अनुसार पाकिस्तान की संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली में 10 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं। वहीं चार प्रांतों की विधानसभा में 23 सीटों पर आरक्षण दिया गया है।पाकिस्तान में कुल 342 सीटें हैं। जिनमें से 272 सीटों पर सीधे जनता चुनकर अपने प्रतिनिधि भेजती है। 10 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए और 60 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।


आप को बतादें कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए संसद में पहुंचने के दो तरीके हैं। इन आरक्षित 10 सीटों का विभाजन राजनीतिक पार्टियों को उन्हें 272 में से कितनी सीटों पर जीत मिली है इसके आधार पर होता है। इन सीटों पर पार्टी खुद अल्पसंख्यक उम्मीदवार तय करती है और संसद में भेजती है। दूसरा विकल्प ये है कि कोई भी अल्पसंख्यक किसी भी सीट पर चुनाव लड़ सकता है। ऐसे में उसकी जीत जनता से सीधे मिले वोटों पर आधारित होगी।
कोई भी अल्पसंख्यक अपने चुनावी क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार को वोट करने के लिए स्वतंत्र है। मतलब वोटिंग का अधिकार सभी के लिए समान है। पाकिस्तान का संविधान 1956 में बना फिर 1958 में दूसरा संविधान आया और फिर 1973 में तीसरा संविधान बना जो अब तक मान्य है। ये संविधान भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को समान अधिकार देने की बात करता है। मतलब पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए सीटें तो आरक्षित हैं ही, साथ ही वो अन्य सीटों से चुनाव भी लड़ सकते हैं। पाकिस्तान में 2018 के चुनाव में महेश मलानी, हरीराम किश्वरीलाल और ज्ञान चंद असरानी सिंध प्रांत से संसदीय और विधानसभा की अनारक्षित सीटों से चुनाव लड़े और संसद पहुंचे।


अब बात करते हैं अफ़गानिस्तान की। वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार अफ़गानिस्तान की आबादी 3.7 करोड़ है। देश में आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है। क्योंकि 70 के दशक के बाद यहां जनगणना नहीं हो पाई।दूसार ओर अमरीका के डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस की रिपोर्ट के अनुसार हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों की संख्या यहां केवल 1000 से 1500 के बीच हैं। अफ़ग़ानिस्तान की निचली सदन जहां प्रतिनिधियों का सीधा चुनाव जनता करती है वहां 249 सीट हैं। यहां अल्पसंख्यकों को चुनाव लड़ने की आज़ादी है। लेकिन नियमों के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में संसदीय चुनाव में नामकरण भरते वक़्त कम से कम 5000 लोगों को अपने समर्थन में दिखाना पड़ता था।ये नियम सभी के लिए एक समान थे। लेकिन इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अपना प्रतिनिधि संसद में भेजना मुश्किल था। 2014 में अशरफ़ ग़नी सत्ता में आए और उन्होंने हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों के समीकरण को देखते हुए निचले सदन में एक सीट रिज़र्व की है।इस समय इस सीट पर नरिंदर पाल सिंह सांसद हैं। इसके अलावा अफ़गानिस्तान की ऊपरी सदन में एक सीट धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए रिज़र्व है। वहां इस समय अनारकली कौर होनयार सदन में सांसद हैं। अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ये नाम तय किए जाते हैं जिसे राष्ट्रपति की ओर से सीधे संसद में भेजा जाता है। कोई भी अल्पसंख्यक अपने चुनावी क्षेत्र के उम्मीदवार को वोट कर सकता है। साथ ही अल्पसंख्यक किसी भी सीट से चुनाव भी लड़ सकते हैं बशर्ते वो अपने लिए पांच हज़ार लोगों का समर्थन जुटा लें।

अब अंत में बात करते हैं बांगला देश की। बांग्लादेश में संसदीय चुनाव में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सीटें आरक्षित नहीं की गई हैं बल्कि महिलाओं के लिए 50 सीटें ही आरक्षित की गई हैं। बांग्लादेश संसद में 350 सीटें हैं जिसमें से 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। साल 2018 में हुए संसदीय चुनाव में 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों में से 18 उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचे। पहले बांग्लादेश की 10वीं संसद में इतने ही अल्पसंख्यक सांसद थे। स्थानीय अख़बारों के अनुसार बांग्लादेश की नौंवी संसद में 14 सांसद अल्पसंख्यक समुदाय से थे। जबकि आठवीं संसद में आठ सांसद अल्पसंख्यक थे।


अब हम बात करते है आरक्षण पर जो कि भारत के लिये अहम बात है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 334 (क) में लोकसभा और राज्यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण संबंधी प्रावधान है। वर्तमान में लोकसभा और राज्यों की विधानसभा में केवल यही आरक्षण है जिसमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित रहती हैं। लोकसभा की 543 में से 79 सीटें अनुसूचित जाति और 41 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिज़र्व हो जाती हैं। वहीं दूसारी ओर विधानसभाओं की 3,961 सीटों में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं। इन सीटों पर वोट तो सभी डालते हैं। लेकिन कैंडिडेट सिर्फ एससी या एसटी का होता है।
मतलब ये है कि भारत में आरक्षित सीट पर उम्मीदवार तय वर्ग का ही होगा। सभी राजनीतिक पार्टियां ऐसे उम्मीदवार को ही टिकट देंगी लेकिन उनका चुनाव जनता के वोट के आधार पर ही होगा।