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20 हफ़्ते नहीं अब 24 हफ़्तों तक करवा सकते हैं गर्भपात
January 29, 2020 • छोटा अखबार • देश - विदेश

20 हफ़्ते नहीं अब 24 हफ़्तों तक करवा सकते हैं गर्भपात

छोटा अखबार।
देश में अब महिलाएं गर्भधारण के 20 सप्ताह तक नहीं 24 सप्ताह तक अपना गर्भपात करवा सकेंगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी संशोधन बिल, 2020 से जुड़े प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई। आगामी बजट सत्र में इसे पेश किया जाएगा। सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बैठक के बाद पत्रकारों को बताया कि गर्भपात की अवधि बढ़ाने की मांग लम्बे समय से महिलाओं की ओर से की जा रही थी। डॉक्टर भी इसकी सिफारिश कर रहे थे और न्यायालय ने भी इस संबंध में आग्रह किया था।


जावड़ेकर ने कहा कि माना जाता है कि असुरक्षित गर्भपात के कारण आठ प्रतिशत महिलाओं की मृत्यु होती है। कई बार बलात्कार पीड़िताओं और बीमार महिलाओं या नाबालिग लड़कियों को गर्भधारण करने का पता नहीं चलता था । वो असुरक्षित ढंग से गर्भपात करा लेती थीं। कुछ मामलों में उनकी मौत भी हो जाती थी। प्रेस विज्ञप्ती के अनुसार समय सीमा विशेष तरह की महिलाओं के लिए बढ़ाई गई है। जिन्हें एमटीपी नियमों में संशोधन के ज़रिए परिभाषित किया जाएगा और इनमें दुष्कर्म पीड़ित, सगे-संबंधियों के साथ यौन संपर्क की पीड़ित और अन्य असुरक्षित महिलाएं भी शामिल होंगी।
इससे बच्चे के मां-बाप पर भी आर्थिक, मानसिक और शारीरित दबाव आ जाता है। कोई भी नहीं चाहता कि बच्चा अस्वस्थ्य पैदा हो।


विधेयक में दो चिकित्सकों की सलाह पर 24 हफ्तों तक गर्भपात का प्रावधान होगा। साल 2014 से सरकार इस मामले को लेकर अलग-अलग पक्षों से बातचीत कर रही थी। इस मामले की शुरुआत बॉम्बे हाईकोर्ट से हुई थी, जब तीन महिलाओं ने याचिका दायर कर 20 हफ्तों के बाद भी गर्भपात कराने की अनुमति देने की मांग की थी। इन महिलाओं का मामला सुनने और डॉक्टर की राय जानने के बाद कोर्ट ने उन्हें गर्भपात की अनुमति दे दी थी।

मद्रास हाई कोर्ट ने एक न्यूज़ रिपोर्ट के आधार के पर स्वत: संज्ञान लेते हुए भारत सरकार से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेंग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट, 1971 में संशोधन करने के लिए कहा था। कोर्ट ने भारत सरकार से पूछा था कि गर्भपात की समयसीमा को 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ़्ते करने के लिए संशोधन करने में कितना समय लगेगा। इसपर भारत सरकार को जून तक जवाब देने के लिए कहा गया था।


मद्रास हाइकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि हर साल करीब दो करोड़ 70 लाख बच्चे जन्म लेते हैं, जिनमें से 17 लाख बच्चे जन्मजात विसंगतियों के साथ पैदा होते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में मामले देर से सामने आने पर 20 हफ्तों में गर्भपात करना संभव नहीं होता। 24 हफ्तों में गर्भपात करने की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि इसमें बच्चा ज़िंदा भी बाहर आ सकता है. ऐसे में उसके इलाज और जब तक वो ज़िंदा रहता है तो उसकी परवरिश की जिम्मेदारी का मसला बना रहता है।